Monday, February 25, 2008

कविता संग्रह

सुन रही हो ना

अशोक सिंघई

समर्पित
सरिता में खिली `सरोज' को


वेब ब्लाग प्रकाशन : संजीव तिवारी

अनुक्रमणिका :-

. शब्द नहीं ध्वनि हो तुम

. तुम हो नहीं हूँ मैं

. दर्द की दवा

. एक उदास चाँद

. पलों के पहाड़

. बगरो बसन्त है

. अपरिचित आवाज़

. शरद-पूनो की रात

. चोरी कभी कभी

१०. दुर्लभ दर्शन

११. मौन सम्वाद

१२. बिन तुम्हारे

१३. नहीं बदली इंतजार की सूरत

१४. तुम ही तुम

१५. अभिव्यक्ति का संकट

१६. नाम तुम्हारा

१७. तुम और मैं

१८. पत्थर के आँसू

१९. साझी अनुभूति

२०. गूँगी खबर

२१. पेड़ों के चुम्बन

२२. नज़रें इनायत

२३. रंगोली

२४. सुंदरतम साक्षात्कार

२५. जुगनुओं के साथ

२६. गंध

२७. बिखरे प्रेम पत्र

२८. उलझा धागा है प्यार

२९. तुम्हारे लिये

३०. बाकी बचा हुआ समय

३१. दूर पास का तिलस्म

३२. थकान की व्यस्ततायें

३३. दर्पण पर बिन्दी

३४. एक और रूप

३५. कही-अनकही

३६. बिदा-गीत

३७. याद

३८. जीवन वाटिका

३९. सुबह से शाम

४०. अप्राप्य पत्र

४१. अपना घर

४२. मेरा रंग

४३. अस्पर्श स्पर्श

४४. मेरी-तुम्हारी नींद

४५. सुन रही हो ना!?

४६. उपलब्धि

४७. साँस की फाँस

४८. प्रेम का घरौंदा

४९. मिलन

५०. श्रृंगार

५१. हाथों में हाथ

५२. मौन सम्वाद

५३. करें शुरु एक जीवन नया

५४. गुनगुनाहट

५५. खिलने लगते हैं प्रश्न

५६. मुझे निहार लो तुम

५७. बात एक रात की

५८. इंतजार की उम्र

५९. प्रेम का मान

६०. मेरी शक्ल हो जाओ

६१. वक्त की कल्पना

६२. स्वप्न का जागरण

६३. देह की दीवार

६४. साँस मेरी महक रही

६५. आहट सुबह की

६६. पत्तियों से छनती धूप

६७. नज़रबंद

६८. चपला

६९. रोमान की लहर

७०. सिहरन की आँच

७१. अनुभूतियाँ

७२. बहार का इंतज़ार

७३. चेहरा दिल होता है

७४. अहसास

७५. पर या पैर

७६. कही-सुनी

७७. कुछ और नहीं

७८. क्या बतायें

७९. जीवन की तलाश

८०. बुढ़ाते माँ बाप

८१. प्रथमांतिम इच्छा

शब्द नहीं ध्वनि हो तुम 1

शब्द नहीं

ध्वनि हो तुम मेरी कविता की

एक अनुगूँज

झंकृत करती उस कारा को

बंदी है जिसमें आत्मा मेरी



रक्ताक्त हैं अँगुलियाँ

खटखटाते द्वार अहर्निश

नहीं होते दर्शन

मैं चिर प्रतीक्षित

व्याकुलता हो गई तिरोहित

न कोई तृष्णा / न मरीचिका

न दौड़ता है मन

अंतरिक्ष के आर-पार

लगाती रहो टेर पर टेर

खुलेंगे एक दिन

इस पिंजर के द्वार

भला जी कर के भी

कौन सका है जी



अन्तराल में

निहारता रहता हूँ छवि

मन है अतिशय उदार

दिखला देता है ध्वनि विरल को

एक नहीं / कई क्षण / कई बार

मत छुओ मन को

हो जाओ मन के पार

नहीं शेष कोई आग्रह

नहीं उठती हिलकोरे ले चाह

कभी नहीं ढूँढी मैंने

कभी नहीं देखी तेरी राह

भला कौन कर सका

आँखें न हों गीलीं



मुटि्ठयों में कैसे हो बंद

शून्य का आलिंगन

अस्पर्श / अब नहीं बढ़ाता संताप

मौन / केवल मौन

अखण्ड चराचर में

निष्कम्प ज्योति सा यह सम्बन्ध

नहीं किसी ने

अब तक परिभाषा दी



शब्द नहीं

ध्वनि हो तुम मेरी कविता की

तुम हो नहीं हूँ मैं 2

मैं देता हूँ

तुम लेती हो

स्पर्श / प्रेम / उष्मा / जीवन

मैं देता हूँ / आकाश हूँ

तुम लेती हो / धरती हो



जो जो / जितना-जितना

लेती हो

कई-कई गुना कर

कर देती हो वापस



तुम धरती हो

पूरी की पूरी / आकाश की

पैरों के नीचे ठोस

हमेशा जुड़ीं

पूरी देह में आँखें ही आँखें

घूमती रहतीं / मुझे निहारने

समूचा का समूचा



मैं आकाश हूँ

पता नहीं / किस-किस धरती का

और नहीं भी / किसी का भी

पूरा का पूरा



देखता दूर-दूर से

जो जो देता

लेने वापस कई-कई गुना



सिर्फ निहारता

मिल नहीं सका तुमसे

अब तक

तुमने ओढ़ रखे हैं

कई-कई रंग

मैं बिखरता रहा

टुकड़े-टुकड़े

देखने तुम्हें

आता रहा / जाता रहा



तुम अमर हो

जैसे कल्पना

तुम सफल हो

जैसे सपना

तुम सजल हो

जैसे आँख

तुम सक्रिय हो

जैसे पाँख



तुम धरती हो

मैं तुम्हें घेरता हूँ

बने रहने को

तुम धरती हो

तुम हो

मैं आकाश हूँ

नहीं हूँ

दर्द की दवा 3

श्वाँस गंध से ही

जान जाता हूँ

हो चुकी उपस्थिति तुम्हारी

उतना ही गर्म हो जाता

वातायन हमारा

जितना शाम को गर्मा देते हैं

झिलमिलाते

अनन्त दूरियों से झाँकते / सितारे



तुम्हारी पगध्वनि से जान जाता हूँ

तय कर ली है

तुमने / कितनी दूरी

और एक अँगुली रख दी

ठीक वहीं पर

दर्द टीस रहा था जहाँ पर

तुमसे बेहतर भला और कौन जान सकता है

दर्द मुझे होता है कहाँ पर



मैं इतना भुरभुरा हो गया

अगरबत्ती की राख जैसा

जमाने ने जैसा चाहा / वैसा उड़ाया

धूल से भी गया-बीता



मैं संतुष्ट और प्रसन्न हूँ

अग्निद्वार से खरी / निकली

गंध बन फैल गया हूँ

हमारे वातायन में





तुम्हारी श्वाँस गंध को

समेटने और सहेजने के लिये



जल कर

राख होकर

अदृश्य होकर

बिखर गया हूँ चतुर्दिक

गंध होकर

एक उदास चाँद 4

छटते ही नहीं बादल

किरणों को देते नहीं रास्ता

उमड़ घुमड़ कर

गरज बरस कर

सोख लेते ध्वनि सारी



बजती ही नहीं पायल

स्मृति का देती नहीं वास्ता

सिसक झिझक कर

कसक तड़फ कर

रोक लेती चीख सारी



दिल ही नहीं कायल

खुशबू ऐसी फैली वातायन में

निरख परख कर

बहक महक कर

टोक देती रीत सारी



दिखता ही नहीं काजल

चाँदनी ऐसी बिखरी उपवन में

घूम घूम कर

चूम चूम कर

रो लेती नींद सारी



तुम नहीं हो पास


आज चाँद बहुत उदास है

पलों के पहाड़ 5

न जाने कितनी

पूख्रणमाओं के बाद

चाँदनी फिर खिली

एक और बार



उड़ा गगन में

एक पंछी

डैनों की हिलोर

स्तब्ध हृदय में

प्रतीति थाप सी

आशाओं में उमड़ा

फिर से ज्वार



रागिनी फिर सजी

एक और बार

न जाने कितनी

पूख्रणमाओं के बाद



थिरकी भावना भी

ठिठकी थी रूप सी रूपसी

सारे ही दृश्य

हो गये अदृश्य से

बिखरी थी वातायन में

एक गंध निर्गंध भी



रातरानी सी महक गई

एक और बार

न जाने कितनी

पूख्रणमाओं के बाद



उड़ी सुधियों पर

सदियों की जमी गर्द

पर्त-दर-पर्त

काटे हैं कितने ही

पलों के पहाड़

भाषाओं में सिमटा

कितना ही दर्द



जिन्दगी जी ली

एक और बार

न जाने कितनी

पूख्रणमाओं के बाद

बगरो बसन्त है 6

जोड़ों में दिखें

दाना चुगते परिन्दे

न ललचाये मन

धूप सेंकने

सकुचायंे लिहाफ़ों के

साज़िन्दे



गुनगुनाहटें

गुनने लगें वन

महकने लगे

सूरज का यौवन



रक्ताभ हो

वृक्षों से झाँके

चन्द्रमा

कपोलों पर लगे दौड़ने

लालिमा



टूटने लगे

नींद की एकासना

मुहूर्त की दस्तकें

हो विदेह की

उपासना



गोद में छिपाकर

दिन भर की धूप को

फिरने लगे

नमी की गंध

बगरो है बसंत

ले लो

पद्माकर की सौगंध

अपरिचित आवाज़ 7

एक उदासी

मुझमें प्रवेश करती जा रही है

कम होती जा रही है

अपरिमित आस्था

तुम्हारे अद्भुत सामर्थ्य में

तुम्हारे अनुपम सौन्दर्य में

तुम्हारे तीखे दर्प में



एक प्यास

मुझमें बुझती जा रही है

बढ़ती जा रही है

अनिश्चित आशंका

हमारे अद्भुत विकास में

हमारे अनुपम इतिहास में

हमारे तीखे दर्द में



एक फाँस

मुझमें धँसती जा रही है

मौन गूँजती जा रही है

अपरिचित आवाज़

किसी के अद्भुत आलाप में

किसी के अनुपम संताप में

किसी के तीखे गान में

शरद-पूनो की रात 8

तेरी दहकाई रोशनियों में

गुम हो जाती है

चाँदनी मेरी



वो भी शरद-पूनो की रात



मेरा वश चले तो

बुझा दूँ सारी बत्तियाँ

मेरी दृष्टि जाती है जहाँ तक

कम से कम तो वहाँ तक



अँधेरे में ही खिलता है चाँद

और आँख-मिचौली खेलती है

चाँदनी साथ अँधेरे के

मैं पपीहा सा राह तकता

आखिर कब दिखे स्वाति नक्षत्र



पर तुम तो गुम रहती हो

बत्तियों के बुझ जाने तक

रोशनियों के बीच

दृष्टि-ताल में तैरतीं



वो भी शरद-पूनो की रात

चोरी कभी कभी 9

हाँ / करता हूँ / मैं भी

चोरी कभी-कभी

कर लेता हूँ चोरी कभी-कभी



सुनसान रातों मे

टहलता मरोदा की सूनसान सड़कों पर

बातें करता ऊँचे-ऊँचे पेड़ों से

नज़र बचाकर तारों की

तोड़ लेता हूँ कुछ फूल मोंगरे के

ताकि महका सकूँ

घर के उस कोने को

पाती है जहाँ विश्राम प्रिया मेरी



होता है यह अपराध

जाने-अनजाने में

मैंने किया सर्वदा

जब-जब अवसर मिला

तभी-तभी

हाँ / कर लेता हूँ / मैं भी

चोरी कभी-कभी

दुर्लभ दर्शन 10

दिखता नहीं अब

चाँद पूरा साफ-साफ

आँखें हो चलीं बूढ़ीं



अपने मन से बह रही हो

हवा ऐसी दिखती नहीं अब

खुश़बू हो गई लापता

बातें हो चलीं झूठीं



कहाँ है अब कोई जो चल रहा हो

कारवाँ ऐसा दिखता नहीं अब

मंज़िल हो गये किस्से तिलस्मी

रातें हो चलीं जूठीं



सदी की सदी / सरक रही है

व्यग्रता ऐसी

प्रयासों की दिखती नहीं अब

साक्षात्कार सूरज का कहाँ नसीब

साँसें लग रहीं रूठीं

मौन सम्वाद 11

तुमने कहा मुझसे

मत टोको मुझे, मत रोको मुझे

कह-कह कर ऐसा

की अपनी मनमानी

मेरे हिस्से आया मौन

कल तक बँधी थी पट्टी आँखों पर

अब ताला है मुँह पर



कुछ सुन लेतीं मेरी भी

नहीं, कुछ खास नहीं है कहने को

तुमको ही टाल नहीं पाता कभी

तुम्हारा कहना जरा सा

बड़ा भारी लगता है

जैसे हो बारिश सीने पर दिसम्बर के

कम भासती है लू, मई के महीने में

मत कहो, कम से कम

तुम तो मत ही कहो



अँगुली उठाती हो

हवा की इस थिरकन से

मैं लगता हूँ समाने धरा की कोख में

गिर जाता हूँ उस नज़र से

देखता हूँ खुद को जिस नज़र से



प्रेम ने ही बाँधी थी कभी आँखों पर

सम्बन्धों में भी कुछ शर्त होती है

कितनी भी ठोस क्यों न हो जिन्दगी

सिद्धान्त, विचार, आदर्श और अनुभूतियाँ

सब में पर्त होती है



खुशी से दिन बीता

बीती शाम कहकहों में

सुबह नज़र आते ओस, कहते

रोना भी है जिन्दगी में

दृष्टि इतनी सबल है

ध्वनि को कष्ट मत दो

दा,े मुझे मौन दो

जिन्दगी की कौंध दो

न हो ध्वनि तदुपरान्त



मुझे मौन से

प्रेम दो, मौन दो

मौन से

बिन तुम्हारे 12

रात के पहले प्रहर से

डूबने लगता है मन

डूबते सूरज के साथ

बिन तुम्हारे



हृदय के घाव की लाली से

लोलित / दिग्-दिगन्त

बिन तुम्हारे / पास के अहसास के

बिन तुम्हारे / उगलता है आग चाँद भी

स्मृतियों के तारे / लगते हैं टिमटिमाने

काटती है शीतल मंद समीर / बिन तुम्हारे



तारों भरा आकाश

देता ही है सुख / खा़लिस सुख

सर्वदा तुम्हारे पास होने पर

लगती है दूरी भली / तारों की

तुम्हारे दूर होने पर

नापता हूँ / उस पैमाने से

दूरी तुम्हारी / बिन तुम्हारे



कर लेता हूँ याद / स्वाद चुम्बनों के

और फिर उतर आती है रात

कान / खड़े हो जाते हैं

सुनने को आहट / हल्की / हवा सी

तुम्हारे चलने-फिरने की / आहट

व्याकुल करती हैं / चौकाती हैं

पदचापों की मृग-स्वप्निकायें

जीने में कोई स्वाद नहीं / बिन तुम्हारे





ढॅक लेता है आँखों को

यादों से उतरा / उजरा रूप

यह भी न हो दूर / सोच कर

ढलक जाती हैं पलकें

गहरी होती जाती रात / लगता

बिखर गईं तुम्हारी अलकें

गहरी होती जाती निद्रा / साथ तुम्हारे

पर कोई नहीं उठाता / ऊगते सूरज के साथ

ऊगते सूरज के साथ

डूबने लगता है मन / बिन तुम्हारे



रात के पहले प्रहर से

डूबने लगता है मन / डूबते सूरज के साथ

बिन तुम्हारे

ऊगते सूरज के साथ / डूबने लगता है मन

बिन तुम्हारे

नहीं बदली इंतजार की सूरत 13

धुँधलका सुबह का / बना सांध्य का झुटपुटा

शीतल समीर भागा / डर से सूरज के

लगे लहराने आँचल श्यामल / मटमैले

घूम-फिर कर / फिर सो गई चिड़िया

वेणियों में महकने लगे

या महकने लगे वेणियों से / गंधराज



कुछ दरक रहा है / सैलाबों से लड़ता है मन

छवि दर्पण पर भारी है

देती होंगी किन्हीं को

यादें जीने का सहारा

मन के हर चैनल पर / चित्र तुम्हारा



सब कुछ धुला-धुला सा

सब कुछ बदला मौसम सा

नहीं बदली इंतजार की सूरत

कौन बताये / कौन पुजारी / कौन मूरत

तुम ही तुम 14

तुम्हे, कभी नहीं

कह पाया तुम



जीवन में मेरे

सपनों सा तैरे

साथ तुम्हारा

कभी किनारा दिखा नहीं

रेखाओं में / सब कुछ गुम



साथ मेरे

कुछ यादें / कुछ सैरें

ख्याल तुम्हारा

कभी अकेला हुआ नहीं

हवाओं में / तुम ही तुम

अभिव्यक्ति का संकट 15

क्या बताऊँ

शब्द नहीं हैं

अभिव्यक्त करने को

क्या था अहसास

जब टपके थे आँसू तुम्हारे

होठों पर मेरे



क्या बताऊँ

देह होती है गर्म

पर सर्द रातों में

गुनगुने लिहाफों में

कुछ अधिक गर्म

लगती है देह

जैसे कुनकुने पानी से

सिक रही है देह

दिल, दिमाग और आत्मा तक



क्या बताऊँ

भरपूर नज़र भर

देख लेने की कोशिश

कुछ और नजर नहीं आता

न दुनिया न दीन

खुद भी खोता जाता

लगता जैसे थम गया सब कुछ

स्थिर हो गई धरा



क्या बताऊँ

रसोईघर से आती

कई मिली-जुली गंध

फर्क साफ समझ में आता

घर में होने और न होने का

छलक जाता मन

घर में होने और न होने पर



भर लो मन

जीवन के रंगों से

सजा लो आल्बम

खट्टे-मीठे प्रसंगों के

स्मृतियों के आवरण में



साँझ जब खेवेंगे

जीवन की नैया

जब टहलेंगे साथ

या छूट जायेगा साथ

इस दुश्चिन्ता की व्याकुलता



क्या होगा अहसास

कैसे करूँ व्यक्त

शब्द नहीं हैं

अभी जीवन के पास

नाम तुम्हारा 16

अँधेरों में

साँप हो जाती है

रस्सी भी

नाम में भी

काम में भी



वही होते हैं जज्ब़े

वही होते हैं अहसास

कोलतार पर पड़ती बारिश

ज़ेहन को कुरेदती

जगा देती दिल में

मिट्टी की पहली सोंधी बास

शहर में भी

गाँव में भी



जब मिले और फिर

झुक जाये नज़र

नज़ारा समेट कर

नज़रों में

सब कुछ मिल जाता है

सब कुछ खो जाने के बाद

खुद जाता है

नाम तुम्हारा ज़ेहन में

भोर में भी

साँझ में भी

तुम और मैं 17

तुम इतनी पास हो मेरे

तुम इतनी साथ हो मेरे

जैसे धरती और गगन



खो जाया करता था मैं

मड़ई-मेलों की मस्तियों में

मन की बंजारा बस्तियों में

डूब जाया करता था मैं

नदी के जल में

भीतर / और भीतर बहता हुआ



आज भी जब घिर जाता हूँ

डूब जाया करता हूँ मैं

अंतस्तल की गहराई में

लगते हाथ और फिसलते जाते सीप

स्मृतियों के / आशाओं के

मैं उठता जाता अनुभूतियों से

ऊपर / और ऊपर सहता हुआ



तुम इतनी पास हो मेरे

तुम इतनी साथ हो मेरे

जैसे गंध और पवन

पत्थर के आँसू 18

मत बहाओ

आँसू सामने मेरे

तुम्हारी आँखों से नि:सृत

मेरी आत्मा तक रिस जाते हैं



पत्थर का मन भी

पसीजता है

बरसात लगती है घेरने

एक लपट सी उठती है

खौलने लगता है रूधिर

शिराओं के भीतर ही भीतर

हाहाकार घुट जाता है

पत्थर के होंठ नहीं हिलते

पत्थर की आँख नहीं भींगती



सरल है आँसू बहाना

कठिन है आँसू पी जाना

हो सके तो / मेरे बाद भी



आँसू मत बहाना



कम से कम / इतना करो वादा

और इसे सचमुच निभाना

आँखों से उच्चारित

यह गीत / सामने मेरे

मत गुनगुनाना



इन में मैं कहाँ तैर पाऊँगा

मत फैलाओ यह सैलाब / सामने मेरे

हाथ हिम्मत के थक रहे हैं

जिन्दगी की डोर है

मुस्कान तेरी

आँसुओं की सैर है

मौत मेरी

साझी अनुभूति 19

काश मैं रो सकता

जैसा एक बार पहले रोया था

जब बस रो ही सकता था



मेरे आँसू बह-बह कर

सोचते हैं बार-बार

मैं उस वक्त नहीं था

तुम्हारे पास

एक रात्रि जागरण करने

तुम्हारे सिरहाने



तुम्हारे मातृत्व से दमकते

चेहरे को / प्यार से निहारने

तुम्हें हल्के से

बाहुपाश में बाँधने

तुम्हारे सिर को

अपनी गोद में सुलाने

या फिर तुम्हारा माथा सहलाने



ताकि बता सकूँ / जता सकूँ

हालॉकि प्रेम है एक बकवास

पर मैं और तुम

ऐसा नहीं करेंगे कभी महसूस

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